"सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में मंगलवार को कहा कि किसी योग्य महिला का अपने करियर को आगे बढ़ाने और अपने बच्चे के लिए सुरक्षित और स्थिर वातावरण सुनिश्चित करने का फैसला क्रूरता या परित्याग नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि एक फैमिली कोर्ट का महिला के डेटिंस्ट के पेशेवर करियर को 'क्रूरता' और 'परित्याग' बताना एक दकियानूसी सोच है। गुजरात हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा था, जिसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गयी थी।"
जस्टिस विक्रमनाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने दोनों अदालतों के इन फौसलों को खारिज कर दिया औरएक पत्नी की अपनी प्रोफेशनल पहचान पति की मर्जी या उसकी छिपी हुई मंजूरी (Veto) की गुलाम नहीं है।
पीठ ने पति और पत्नी, दोनों की ओर से दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कहा कि विवाह अब पूरी तरह टूट चुका है और इसे सुलह की संभावना न होने के कारण तलाक को आधार बनाकर समाप्त किया गया है, न कि पत्नी की ओर से क्रूरता या परित्याग के आधार पर। कोर्ट ने इस बात का भी संज्ञान लिया कि पति ने दूसरी शादी कर ली है और पत्नी के खिलाफ झूठी गवाही का मामला चलाने की अर्जी खारिज कर दी।
फैमिली कोर्ट की टिप्पणियों की कड़ी आलोचना
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने फैमिली कोर्ट द्वारा महिला के खिलाफ की गई टिप्पणियों को हटाते हुए कड़ी टिप्पणी की। जस्टिस मेहता ने पीठ की ओर से लिखे फैसले में कहा, हम 21वीं सदी में हैं और इसके बावजूद एक योग्य महिला द्वारा अपने पेशेवर करियर को आगे बढ़ाने और बच्चे के पालन-पोषण के लिए सुरक्षित और स्थिर वातावरण सुनिश्चित करने के प्रयास को निचली अदालतों ने क्रूरता और परित्याग के रूप में देखा है।
पीठ ने फैमिली कोर्ट की उन टिप्पणियों की आलोचना की, जिन्हें हाई कोर्ट ने भी बरकरार रखा था। शीर्ष अदालत ने कहा कि ये टिप्पणियां न केवल कानूनी रूप से अस्थिर हैं, बल्कि अत्यंत चिंताजनक भी हैं।
' सिर्फ शादीशुदा जिंदगी की जिम्मेदारियों से बंधी नहीं रह सकती पेशेवर महिला'
शीर्ष अदालत ने कहा, एक शिक्षित और पेशेवर रूप से योग्य महिला से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह केवल वैवाहिक जिम्मेदारियों में बंधी रहे। शादी उसकी व्यक्तिगत पहचान को खत्म नहीं करती, न ही उसके व्यक्तित्व को उसके पति की पहचान के अधीन कर देता है। पीठ ने आगे कहा कि पति और पत्नी दोनों का यह दायित्व है कि वे अपने वैवाहिक संबंधों में एक-दूसरे की आकांक्षाओं का सम्मान करते हुए संतुलन बनाए रखें, न कि कोई एक पक्ष दूसरे के जिंदगी के फैसलों को एकतरफा रूप से नियंत्रित करे।
"यह मामला एक वैवाहिक विवाद से शुरू हुआ था, जो एक योग्य महिला डेंटिस्ट और भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट कर्नल के पद पर तैनात उनके पति के बीच था। साल 2009 में शादी के बाद पत्नी ने शुरू में पुणे में अपनी निजी प्रैक्टिस छोड़कर अपने पति के साथ कारगिल में उनकी तैनाती वाली जगह पर जाने का फैसला किया।"
हालांकि, प्रेग्नेंसी और उसके बाद बेटी को हुई मेडिकल कॉम्पलिकेशन के कारण पत्नी बेहतर इलाज और बच्चे के स्थिर पालन-पोषण के लिए अहमदाबाद चली गईं। वहां उन्होंने एक डेंटल क्लिनिक खोला।
"बाद में फैमिली कोर्ट ने क्रूरता और परित्याग के आधार पर पति की तलाक की अर्जी स्वीकार कर ली, जिसपर हाई कोर्ट ने भी मुहर लगा दी। निचली अदालत का तर्क था कि पत्नी का यह अनिवार्य कर्तव्य है कि वह पति की तैनाती के स्थान पर उसके साथ रहे और उसने अपने वैवाहिक दायित्वों की तुलना में अपने करियर को प्राथमिकता दी।"
Picture Source :

